अश्लीलता की सीमा तक कंडोम के विज्ञापन

प्लेगार्ड

अश्लीलता की सीमा तक कंडोम के विज्ञापन

अश्लीलता की सीमा तक कंडोम के विज्ञापन अब सुबह 6 बजे से लेकर रात 10 बजे तक टीवी पर कंडोम के विज्ञापन नहीं दिखाई देंगे.

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने टेलीविज़न चैनलों को इस दौरान कंडोम के विज्ञापन न दिखाने की सलाह दी है.

मंत्रालय का कहना है कि बच्चे ऐसे विज्ञापन न देखें, इस वजह से रोक लगाई गई है.

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने सभी टेलीविज़न चैनलों को एडवाइज़री जारी करते हुए कहा है कि वे इन 16 घंटो के दौरान कंडोम के विज्ञापन न दिखाएं.

मंत्रालय ने बताया कि उन्हें इस सिलसिले में कई शिकायतें मिलती रही हैं जिसके बाद ये फ़ैसला लिया गया है.

सूचना प्रसारण मंत्रालय की सलाह

यौन शिक्षा पर इसका क्या असर पड़ेगा?

एडवरटाइज़िंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल ऑफ़ इंडिया (एएससीआई) की सेक्रेटरी जनरल श्वेता पुरंदरे के मुताबिक़,

मंत्रालय को कुछ ख़ास घंटों के दौरान कंडोम के विज्ञापन दिखाने का प्रस्ताव उन्होंने ही दिया था.

श्वेता ने बीबीसी को बताया कि दुनिया में भारत ही अकेला ऐसा देश नहीं है.

बड़ों के लिए इस तरह का कंटेंट वॉटरशेड टाइमिंग में दिखाने का चलन अमरीका और यूके में भी है.

लेकिन क्या विज्ञापन बंद करने से सेक्स एजुकेशन पर असर नहीं पड़ेगा?

श्वेता के मुताबिक़ कंडोम के विज्ञापन में सेक्स एजुकेशन नहीं होती.

लेकिन एक सवाल यह भी है कि कंडोम के विज्ञापन सालों से टीवी पर आते रहे हैं फिर अभी इस तरह की रोक क्यों?

क्या इसकी वजह विज्ञापनों में दिखाई जाने वाली सामग्री है?

इसके जवाब में श्वेता कहती हैं कि विज्ञापन दिखाना ग़लत नहीं है.

बस ये विज्ञापन बच्चों के लायक नहीं हैं और यही शिकायतकर्ता का भी कहना है.

 

कंडोम

कितने बदल गए कंडोम के विज्ञापन?

सुरक्षित सेक्स को बढ़ावा देने के लिए सबसे पहले निरोध का विज्ञापन आया था.

‘दांतों तले क्या इश्क़ कट रहा है, दिल बेईमान, बेईमान, बेईमान है’,

इस विज्ञापन में न तो किसी का चेहरा नज़र आया न ही कोई डायलॉग.

बैकग्राउंड में बजते ख़ूबसूरत से गीत के साथ लड़के और लड़की के पैरों की हरकत ही विज्ञापन का पूरा संदेश बयां कर देती है.

शेखर सुमन का कंडोम विज्ञापन अब आपको शायद याद न हो.

जिसमें मेडिकल स्टोर पर खड़ा एक शख़्स दुकानदार से कंडोम मांग भी नहीं पा रहा है.

कंडोम की जगह बाम मांग लेता है.

कंडोम न मांग पाने की बेचारगी और झिझक को शेखर सुमन ने बड़ी ही ख़ूबसूरती से पर्दे पर दिखाया है.

उसके बाद दुकानदार कंडोम इस्तेमाल करने का तरीक़ा बताता है.

सुरक्षित सेक्स को प्रमोट करने के लिए बनाया गया यह विज्ञापन काफ़ी मशहूर भी हुआ था.

भारत सरकार का ‘यही है सही’ स्लोगन भी चर्चा में रहा.

जिसमें सुहागरात के बिस्तर पर रखे कंडोम से सुरक्षित सेक्स का संदेश देने की कोशिश की गई थी.

पति-पत्नी बिस्तर पर बैठकर बात करते हैं और पति कंडोम के पैकेट की तरफ़ देखकर कहता है कि दोस्त, आज सिर्फ़ बातें.

दूरदर्शन पर आने वाला कोहिनूर कंडोम का विज्ञापन भी आपको याद होगा.

‘इस रात की सुबह ही नहीं’ स्लोगन वाला यह विज्ञापन भी खूब पसंद किया गया था.

बिना किसी डायलॉग और एक्शन के विज्ञापन ने संदेश देने की कोशिश की थी.

बीबीसी के ‘जो समझा वही सिकंदर’ कंडोम विज्ञापन को भी लोगों ने काफ़ी पसंद किया.

सिर्फ़ एक रिंगटोन, जो ये संदेश देती है कि कंडोम का इस्तेमाल करना ही समझदारी है.

विज्ञापन में न तो कोई बंद कमरा है, न सिर्फ़ लड़का और लड़की.

विज्ञापन इसलिए भी ख़ास है क्योंकि इसमें संदेश किसी एक के लिए नहीं है.

शादी का समारोह है और अचानक से एक शख्स के मोबाइल में कंडोम की रिंग टोन बजने लगती है.

कंडोम शब्द सुनकर जहां वो शख्स झेंप जाता है वहीं वहां मौजूद बाकी सबी उसके लिए तालियां बजाने लगते हैं.

कंडोम

समय के साथ बदला विज्ञापन

लेकिन समय बदला और कंडोम के विज्ञापन को दिखाने का तरीका भी. 1991 में ‘कामसूत्र’ कंडोम का विज्ञापन बड़ी चर्चा में रहा.

कंडोम के विज्ञापनों में कामुकता की बात करें तो पूजा बेदी का ‘कामसूत्र’ के लिए किया गया विज्ञापन आज भी याद किया जाता है.

लगभग पूरा विज्ञापन बाथरूम में शूट किया गया था.

‘मैनफ़ोर्स के कंडोम विज्ञापन को भी लोगों ने काफ़ी पसंद किया. सनी लियोनी के साथ शूट किए गए इस विज्ञापन की मादकता ‘मन क्यों बहका…’ गाने से और बढ़ गई.

जब रणवीर सिंह ने ‘ड्यूरेक्स’ का विज्ञापन किया तो उन्हें काफी आलोचना सहनी पड़ी लेकिन यूथ-आइकन होने के नाते रणवीर ने अपने इस कदम को सही बताया.

बिपाशा बसु और उनके पति करण सिंह ग्रोवर पर फिल्माए गए ‘प्लेगार्ड’ कंडोम के विज्ञापन को लेकर भी काफ़ी विवाद हुआ था. स्पॉटबॉय नाम की एक वेबसाइट ने ख़बर भी छापी थी कि सलमान ख़ान ने बिग बॉस के घर में रखे ‘प्लेगार्ड’ के पोस्टर को हटवा दिया था. कहा गया ‘इट्स टू हॉट टू हैंडल’.

निरोध

क्या कहते हैं जानकार

ऐड गुरू एलेक पद्मसी के मुताबिक़ तब इस विज्ञापन को लेकर बवाल हुआ था और एएससीआई के पास शिकायत गई थी.

कामसूत्र कंडोम की टैगलाइन थी ‘Pleasure of making love’ यानी प्यार करने से मिलने वाली ख़ुशी.

एलेक पद्मसी ने बताया कि एएससीआई को तब इस टैगलाइन से दिक्कत थी,

लेकिन वो मुझे इसका दूसरा विकल्प नहीं सुझा पाए और यही वजह है कि आज तक इसी टैगलाइन से ये कंडोम बिक रहा है.

सूचना प्रसारण मंत्रालय के हालिया निर्देश पर एलेक पद्मसी ने कहा कि, “जब आप बच्चे को चॉकलेट खाने से मना करते हैं तो क्या होता है,

वो और ज़्यादा खाता है. कभी-कभी छुपा कर और चुरा कर खाता है.

ठीक वैसे ही बच्चे को कंडोम के ऐड नहीं दिखाएंगे तो वो यूट्यूब पर देखेगा. इससे वो विज्ञापन देखना बंद नहीं कर देगा.”

कम्युनिकेशन एक्सपर्ट राधारानी मित्रा के मुताबिक़ सुरक्षित सेक्स के लिए कंडोम का इस्तेमाल होना चाहिए.

इसका विज्ञापन दिखाने पर कोई रोक नहीं होनी चाहिए. सबका अश्लीलता का पैमाना अलग-अलग होता है.

कंडोम

पॉपुलेशन फ़ाउंडेशन ऑफ़ इंडिया की पूनम मुटरेजा के मुताबिक़, “सरकार ने ये फ़ैसला जल्दबाज़ी में लिया है.

हम उनसे इस बारे में बात करेंगे. एक विज्ञापन में कुछ ग़लत है तो इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं कि विज्ञापन दिखाना ही बंद कर दिया जाए.”

पूनम मुटरेजा कहती हैं, “कंडोम के विज्ञापन का मक़सद जनसंख्या नियंत्रण और एचआईवी जैसी गंभीर समस्या के बारे में लोगों को बचाव के तरीके बताना है.

भारत में आज भी 1.5 करोड़ गर्भपात होते हैं, उनमें से कई अनचाहे गर्भधारण की वजह से होते हैं

और अनचाहे गर्भधारण को रोकने के लिए कंडोम बहुत ज़रूरी है. सरकार भी इसे मानती है तो फिर विज्ञापन पर पांबदी कैसे सही है?”


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