दिल्ली जी बी रोड-देह का डस्टबिन-दर्द है हर तरफ

कैसी होती है जी बी रोड  की दिवाली ?

रेड लाइट एरिया की वो गली जहां से गुज़रते ही लोग आपसे पूछने लगते हैं कि सर, 17 साल की नेपाली है.

एक हज़ार में हो जाएगा.

आम तौर पर ऐसा लगता था कि कोठे पर चारों तरफ़ नींद पसरी है.

अस्त-व्यस्त कमरों में लोग जहां तहां सोए दिखते थे.

ऐसा लगा था कि नींद में सोया एक प्लेटफॉर्म है.

लेकिन दिवाली की रात तो यहां का आलम ही कुछ और था.

ऐसा लग रहा था कि रात नहीं दिन का हाल है.

उस गली से गुज़रने वाला हर इंसान उनके लिए ग्राहक है.

आप उन्हें लाख समझाएं लेकिन वो मानने को तैयार नहीं होते.

जैसे ही सड़क से कोठे की सीढ़ी की तरफ़ बढ़े एक एजेंट ने पूछा- सर, इंजॉय करना है. कश्मीरी लड़की मिलेगी.

हमलोग अनसुना करते हुए एक कोठे की सीढ़ी पर चढ़ने लगे. रात के 11 बज रहे थे. गहमागहमी ऐसी थी कि मानो ये नारी उपेक्षिता नहीं बल्कि इनके ईर्द-गिर्द ही सारी दुनिया है.

जैसे ही एक कमरे में पहुंचे, वहां काफ़ी भीड़ थी.

दुनिया जिन्हें तवायफ़ कहती है वो किसी पेशेवर कलाकार की तरह डांस कर रही थीं.

वो जमकर नाच रही थीं. गाने भी गा रही थीं

भोजपुरी गानों की धुन पर इनके क़दमों की रफ़्तार देखते बन रही थी.

ख़ूबसूरत साड़ियों में लिपटीं इन महिलाओं का पायलों के घुंघरु पर पूरा नियंत्रण था. घुंघरुओं की आवाज़ और क़दमों की गति में ग़ज़ब का तालमेल था.

जीबी रोड का कोठा

कमरे इस तरह से सजे थे कि फ़िल्मों में कोठे सजने वाली लाइनें याद आने लगीं. चारों तरफ़ गेंदे के फूल लटक रहे थे.

रंगीन प्लास्टिक दीवारों पर लिबास की तरह लिपटे थे. अपने अंधेरों के लिए कोठे जाने जाते हैं, लेकिन दिवाली की रात यहां का अंधेरा पूरी तरह गायब मालूम पड़ रहा था.

कमरों में एक किस्म की ख़ुशबू पसरी थी. कोई ऐसा चेहरा नहीं दिखा जिस पर उस पल उदासी की एक रेखा भी हो. हर इंसान के जिस्म अच्छे कपड़ों से ढके थे.

महिलाएं बिना रुके नाच रही थीं. कोई बदतमीज़ी नहीं. पास में एक बेंच पर क़रीब 50 या 55 साल की एक महिला बैठी थीं. उनसे पूछा कि आपलोग दिवाली ऐसे ही मनाती हैं?

उन्होंने कहा, ”हां, हमलोग की दिवाली यही है. देख लो.”

एक महिला को शक हुआ कि मैंने वहां की तस्वीर ले ली है. उन्होंने मोबाइल मांगा और पूरा देखने के बाद ही लौटाया.

उन्होंने पूछा कि तुमलोग को क्या चाहिए?

हमने कहा कि कुछ नहीं बस आपलोग की दिवाली देखने आए हैं.

उन्होंने कहा कि ठीक है देख लो आराम से.

कमरे और सीढ़ी में कितना फ़र्क़ था

मानो अंधेरा कह रहा हो कि वो दूर नहीं है और अगली सुबह से ही अपना साम्राज्य हासिल करने वाला है. कमरे के बाहर अंधेरा था.

खंडहर इमारत की ये सीढ़ियां बता रही थीं कि कल सुबह आकर देखना.

उस बुज़ुर्ग महिला के चेहरे पर कोई निराशा नहीं थी,

लेकिन बात करते हुए साफ़ महसूस हो रहा था कि यह रात कुछ घंटों में सुबह बन जाएगी और दिवाली फिर एक साल बाद आएगी.

अगली दिवाली में क्या महिलाएं यहीं रहेंगी?

किसी को नहीं पता. यहां कुछ भी तय नहीं है.

चंद मिनट में सजी महफ़िल मलबे में तब्दील हो जाती है.

पर डर और बदनामी के साए में अगर आपको बेफ़िक्र जश्न देखना हो तो,

दिवाली की रात इन कोठों के अलावा शायद ही कहीं मिले.

दिवाली के बाद दिल्ली के आसमान में धुंध छा गई है,

पर इन कोठों पर रहने वाली महिलाओं की ज़िंदगी से धुंध कभी ख़त्म नहीं होती.

इनके लिए कोई सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला इतनी तत्परता से नहीं आता जिससे धुंध छंट सके.

लोग यहां सेक्स ख़रीदने आते हैं

 

हां, ये महिलाएं सेक्स बेचती हैं. जो सेक्स बेचती हैं उन्हें हम तवायफ़ कहते हैं,

लेकिन जो ख़रीदता है वो ख़ुद को मर्द समझता है.

बेचने वाले बदनाम हैं और ख़रीदने वाले महान

आख़िर ऐसा कैसे हो सकता है? आपकी नज़र में ये कोठे, ये गलियां चाहे जो कुछ भी हों, लेकिन यहां ज़मीर है.

इनसे बात कीजिए तो इनके मन में अथाह अनास्था है. भरोसा का शब्द इनके लिए धोखा है.

पत्रकारों से उम्मीद नहीं है. एनजीओ को ये गाली देती हैं. और सरकार की तो बात ही मत पूछिए.

शीला दीक्षित एकमात्र ऐसी नेता हैं जिनकी ये महिलाएं जमकर तारीफ़ करती हैं.

ये कहती हैं कि शीला राज में इन्हें राशन मिलता था.

ये अब आधार से ख़ुद को निराधार और बेबस महूसस करती हैं. अब सुबह हो चुकी है.

दिवाली भी दूर चली गई. फिर वही खामोशी, वही बदनामी और अंधेरे में समाये ये ख़ंडहर, जहां कुछ महिलाएं अपनी देह को डस्टबीन बनाने का इंतज़ार करने के लिए बेबस हैं.


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