60 वर्षीय महबूबा मुफ्ती ने अपने चाचा जी के साथ मनाई थी सुहागरात

जब एक तरफ पूरा हिंदुस्तान नापाक पाकिस्तान की  दहशतगर्दी से परेशान है और आतंकवादियों की चुनौतियों का सामना कर रहा है, उसी समय  महबूबा मुफ्ती  का  पाकिस्तान प्रेम  अंगड़ाइयां ले लेकर जवान हो रहा  है।  दरअसल इसके पीछे एक लंबा इतिहास  है कि आखिर क्यों  महबूबा मुफ्ती  के मन में  पाकिस्तानी  अलगाववादियों  और आतंकवादियों के लिए श्रद्धा  और  प्यार की भावनाएं  मचल रही है । कुछ दिन पहले इंडिया टीवी के शो आप की अदालत में भी महबूबा मुफ्ती ने पाकिस्तान के प्रति और पाकिस्तान की फौज के प्रति गहरा लगाव दिखाया था और छुपे हुए ढंग से भारत को धमकियां दी थीं और पाकिस्तान की फौज की शक्ति का महिमामंडन भी किया था और यह भी कहा था कि अगर भारत ने पाकिस्तान में किसी किस्म का हमला किया तो पाकिस्तान की फौज भी उसका जवाब सख्ती से दे सकती है। बहरहाल इंडिया टीवी में दी गई इंटरव्यू में महबूबा मुफ्ती ने जो सवाल किए थे उनका जवाब भारतीय एयरफोर्स ने महबूबा को बखूबी दे दिया है और यकीनन महबूबा मुफ्ती की अंदरूनी तसल्ली भी हो गई होगी लेकिन महबूबा के पाकिस्तान और आतंकवाद के प्रति जुनून भरे प्यार का क्या कारण है इसको जानने के लिए आपको पिछला इतिहास बताते हैं। एक समय कश्मीर के अलगाववादी नेता के तौर पर जाने जाते मुफ्ती मोहम्मद सईद की औलाद और कांग्रेस की सियासी पैदावार महबूबा मुफ्ती पहली बार तब चर्चा में आई थीं जब 1996 में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर बिजबेहारा से जीत हासिल कर सबसे ज्यादा चर्चित चेहरा बन गई थीं। यहीं से महबूबा ने राजनीति में कदम रख दिया था।

महबूबा मुफ्ती ने कश्मीर विवि से वकालत की पढ़ाई की। पढ़ाई के दौरान ही 25 साल की मनचली महबूबा मुफ्ती का दिल अपने से 7 साल छोटे और अपने पिता मुफ़्ती के छोटे भाई यानी कि उसके अपने ही 18 वर्षीय चाचा श्री जावेद इकबाल पर दिल आ गया और उसके साथ इश्क हो गया और  उसने रात को  अपने पिता को कहा कि वो चचाजान से शादी करना चाहती है  लेकिन मुफ्ती इसके लिए राजी नहीं हुए लेकिन फिर महबूबा की मोहब्बत के आगे झुक गए और महबूबा ने अपने चाचा जी से निकाह कर लिया। चाचू के साथ सुहागरात मनाने के बाद भी ये इश्क ज्यादा देर तक नहीं चला और जज्बातों के शोले ठंडी राख में तब्दील हो गए ।
जावेद इकबाल का कहना था कि महबूबा उनसे 7 साल बड़ी थी और इकबाल ने महबूबा मुफ्ती के साथ रिश्तों को लेकर ‘द टेलीग्राफ’ को दिए इंटरव्यू में कहा था, मैं तब बहुत कमउम्र था, उस समय हो रही बहुत सी बातों को मैं समझ भी नहीं पाया कि क्या हो रहा है ।

जावेद इकबाल का बड़ा बिजनेस था। वहीं महबूबा भी राजनीति में कदम रख चुकी थीं। इसी दौरान उनकी एक बेटी हो गयी। जिसका नाम दोनों ने इल्तिजा रखा। यहां तक दोनों की शादीशुदा जिंदगी ठीक चल रही थी। इसके बाद दोनों की दूसरी बेटी हुई जिसका नाम दोनों ने इर्तिका रखा। इसके बाद से ही दोनों के संबंध ठंडे पड़ने शुरू हो गए । महबूबा का कहना था कि उनका पति जावेद परिवार की ओर ध्यान ही नहीं देता है। इस वजह से महबूबा ने तलाक ले लिया। हालांकि इसके बाद जावेद ने पूरे परिवार से खूब दुश्मनी निभाई और हर जगह महबूबा और उनके पिता का विरोध किया। दूसरे शब्दों में कहें तो जम्मू कश्मीर को संभालने का दावा करने वाली महबूबा अपने पति को ही नहीं संभाल पाई।

साल 1989 की 2 दिसम्बर को विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार में मुफ्ती मोहम्मद सईद ने पद और गोपनीयता की शपथ ली थी और भारतीय संविधान का पालन करने की कसम भी खाई थी। पद ग्रहण करने के मात्र छ: दिनों के भीतर 8 दिसम्बर 1989 को उनकी छोटी पुत्री रुबिया सईद का अपहरण हो गया। अपनी पुत्री को आतंकियों के कब्जे से निकालने के लिए महज छ: दिनों के भीतर भारत सरकार पर दबाब डलवाकर मुफ़्ती मुहम्मद ने पांच खूंखार आतंकवादियों, जेकेएलएफ का एरिया कमाण्डर शेख अब्दुल्ला हमीद,मकबूल बट का छोटा भाई गुलाम नबी बट,नूर मोहम्मद कलवाल,मुहम्मद अलताफ और जावेद एहमद झरगर को जेल से रिहा करवा दिया था। जब ये आतंकी जेल से छूटे अलगाववादियों ने जमकर खुशियां मनाई और इन्हे बाकायदा जुलूस बनाकर जेल से ले जाया गया।
छब्बीस साल बाद वर्ष 2015 में उसी शख्स ने राज्य के मुख्यमंत्री का पद संभालते ही दस लाख के ईनामी आतंकी मसर्रत आलम को रिहा कर दिया। छब्बीस साल पहले मुफ्ती मोहम्मद सईद देश के गृहमंत्री थे और जिन आतंकियों को रिहा किया गया था,वे काश्मीर की जेल में बन्द थे। उस समय राज्य के मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला थे। किसी कैदी को रिहा करना मुख्यमंत्री के हाथों में होता है। केन्द्रीय गृह मंत्री सीधे किसी कैदी को जेल से रिहा नहीं कर सकता। रुबिया सईद प्रकरण के कई सालों बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला ने यह रहस्योद्घाटन किया था कि रुबिया की रिहाई के बदले आतंकियों को छोडने के मामले में उनकी सरकार को बर्खास्त कर देने तक की धमकी दी गई थी। उन्हे कहा गया था कि यदि वे आतंकियों को रिहा नहीं करेंगे तो उनकी सरकार बर्खास्त कर दी जाएगी।
महबूबा मुफ्ती से जुड़े कुछ मुख्य विवाद भी हमेशा उनके साथ रहे हैं।
महबूबा मुफ्ती की पार्टी ने कश्मीर का एक नक्शा जारी किया उसमें अक्साई चीन और कराकोरम जैसे लद्दाख के इलाकों को, जिस पर फिलहाल 1962 से चीन ने कब्जा किया हुआ है। बाकायदा चीन के राजकीय लाल रंग से और पाक अधिकृत कश्मीर को पाकिस्तानी झंडे के हरे रंग से दर्शाया गया है।
महबूबा मुफ्ती अकसर घाटी में हिंदू विरोधी भावनाएं भड़काती रहती हैं। चाहे वह कश्मीरी पंडितों का हो या अमरनाथ यात्रा का। अमरनाथ यात्रा का तो वह हर साल विरोध करती हैं। एक बार तो उन्होंने यह तक कह दिया था कि हिंदू यहां आकर गंदगी फैलाते हैं।


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