बालकोट हमला असलियत-अय्याश मीडिया और आई एस आई

पाकिस्तान के बालाकोट में भारतीय वायु सेना द्वारा की गई सर्जिकल स्ट्राइक के चलते वहां मौजूद जैश ए मोहम्मद के आतंकी शिविर को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचा है और इस शिविर को बुरी तरह तबाह कर दिया गया।


बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद का यह कैंप 6 एकड़ में फैला था और आतंकियों का गढ़ था। यहां के सैयद अहमद शहीद सेंटर से आतंकियों के आका आत्मघाती हमलावर तैयार करते थे। जिनकी सहायता से जैश भारत में आत्मघाती हमले कराता था। यह एक फाइव-स्टार ट्रेनिंग सेंटर था, जिसमें जिम से लेकर स्विमिंग पूल तक सब था।
एयर फोर्स ने बालकोट में जिस जैश कैंप को तबाह किया है वह किसी फाइव स्टार से कम नहीं था।

बालाकोट के के जंगल में 6 एकड़ में फैले जैश-ए-मोहम्मद के टेरर सेंटर की एंट्री से ही अपने कमांडरो के दिल और दिमागों पर नफरत की छाप छोड़ दी जाती थी। इंटेलिजेंस के एक डॉक्युमेंट में यह बात सामने आई है कि इन सेंटर्स को बेहद खौफनाक रूप दिया जाता था। इनकी सीढ़ियों पर अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम और इजरायल के झंडे पेंट किए गए थे, ताकि कमांडरों को अपने दुश्मन याद रहे।


इस सेंटर में करीब 600 लोग आ सकते थे। यहां एक पार्किंग लॉट केवल मौलाना मसूद अजहर और उसके भाइयों के लिए बना हुआ था। मुख्य हॉल की सीलिंग में तेज LED लाइटें और जेश के झंडे लगे थे। हाल ही में शामिल किए गए कम से कम 26 रिक्रूट रावलपिंडी और अटॉक जिले से थे। इनमें से सबसे छोटा 21 साल का अब्दुल हफीज था।

पाकिस्तान के गुजरात, मियांवली, फैसलाबाग, मुजफ्फरनगर, राजनपुर, सहिवाल, मुल्तान, बहावलपुर , रावलपिंडी और अटॉक से लोग बालाकोट में ट्रेनिंग ले रहे थे। उनका चुनाव जाति और समुदाय के आधार पर होता है। अबु बकर नाम का शख्स बहावलपुर माहरा जाति का था और शाबिर हुसैन मुल्तान के जाट समुदाय से था। इस सेंटर की शुरुआत 2003-04 में हुई थी और अफगान जंग के लड़ाके जो सोवियत अधिग्रहण के खिलाफ लड़े थे, वे ट्रेनर का काम करते थे।


इस शिविर में लगभग 350 के करीब दहशतगर्द भारतीय सेना के हूर मिलाप कार्यक्रम से लाभान्वित हुए जिसमें जैश ए मोहम्मद के बड़े लीडर भी शामिल थे। इस हमले में मारे गए आतंकवादियों की सच्चाई और गिनती को लेकर कई वेब चैनलों द्वारा जमकर झूठ बोला जा रहा है और उन्हीं बातों को दोहराया जा रहा है जो बातें पाकिस्तान द्वारा उनको परोसी जा रही है।

पाकिस्तान ने इस हमले के बाद बालाकोट व चकोटी के इलाके में युद्ध स्तर पर काम करते हुए मारे गए आतंकवादियों की लाशों को वहां से हटाया,बमवर्षा से बने गड्ढों को पूरी तरह से भर दिया और जैशे मोहम्मद के हेड क्वार्टर के इर्द-गिर्द जल्दबाजी में दीवारें खड़ी करके उनको मिट्टी मिले हुए चूने से पोत दिया और इसके बाद अल जजीरा जैसे मुस्लिम चैनल सहित कुछ अन्य एजेंसियों के पत्रकारों को भाड़े पर ले के घटनास्थल पर पाकिस्तानी आर्मी की देखरेख में ले जाया गया और दूर से उनको वहां का दृश्य दिखा कर यकीन दिलाने की कोशिश की गई कि वहां पर कोई खास नुकसान नहीं हुआ। लेकिन जब कुछ पत्रकारों ने जैशे मोहम्मद के हेड क्वार्टर की तरफ बढ़ने की कोशिश की तो पाकिस्तानी आर्मी ने उन्हें वहां जाने से रोक दिया क्योंकि अभी तक उस इमारत के अंदरूनी हिस्से में बुरी तरह से खून और दीवारों से लिथड़ी हुई चर्बी और आंतों के साथ साथ तबाह हुए कमरों के निशान और इमारत की सीढ़ियों पर विदेशी फ्लैग के निशान बाकी थे और इसी इमारत में राकेट लांचर और ak-47 जैसे हथियारों के अवशेष भी मौजूद थे और वह इतनी बड़ी मात्रा में थे कि इतनी जल्दी उनको हटाना मुमकिन नहीं था और अगर पाकिस्तानी सेना अपने कहे के मुताबिक पत्रकारों को जल्दी घटनास्थल का दौरा ना करवाती तो कई दिनों के बाद अंतरराष्ट्रीय सत्र पर पाकिस्तानी सेना और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के वक्तव्य की छीछालेदर होना लाजमी था इसलिए पाकिस्तानी सेना ने एक दिन में ही लीपापोती करते हुए अपने पसंद के मीडिया को बालाकोट के एरिया का अवलोकन करवाया और खुद खींची गई फोटो उस मीडिया टीम में शामिल पत्रकारों को मुहैया करवाई। इस टीम में मौजूद पत्रकारों को पाकिस्तान की सेना के द्वारा ऐशो इशरत का हर सामान उपलब्ध करवाया गया। बताया जाता है कि पाकिस्तानी सेना की खासतौर पर हिदायत थी कि बालाकोट का दौरा करने वाली पत्रकारों की टीम में कोई भी महिला शामिल ना हो। यह भी चर्चा है कि पाकिस्तान की आईएसआई के द्वारा कुछ चुनिंदा पत्रकारों को शराब , कबाब और शबाब परोसने का इंतजाम भी किया गया, जिसके लिए लाहौर से विशेष रूप से कॉलगर्लों का इंतजाम भी किया गया और इसके बाद उन खास पत्रकारों ने पाकिस्तान द्वारा बजाई गई मन डोले तन डोले मार्का बीन की धुन पर झूम कर आई एस आई द्वारा की गई सेवा का हक अदा किया।
अगर पाकिस्तान ऐसा ना करता तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय फौज के पराक्रम के चलते पाकिस्तानी फौज की बुरी तरह से किरकिरी होनी थी। घटनास्थल से तुरंत बाद कुछ बाशिंदों ने मारे गए आतंकवादियों के फोटो खींचे और पाकिस्तान की आर्मी द्वारा स्थापित किए गए अस्थाई अस्पताल में दाखिल घायलों के फोटो सहित,मारे गए लोगों के जनाजे में शामिल उनके रिश्तेदारों के फोटो भी सबूत के तौर पर कुछ पत्रकारों को दिए लेकिन ज्यादातर ने ये फोटोग्राफ प्रकाशित करना जायज नहीं समझा। गौरतलब है कि हमले के बाद भारत ने जैश ए मोहम्मद के जिन टॉप कमांडरों के मारे जाने की लिस्ट जारी की थी उनमें से एक के भी जिंदा होने का कोई भी सबूत पाकिस्तानी फौज ने पेश नहीं किया क्योंकि अगर उनमें से कोई भी अगर जिंदा होता तो यकीनन पाकिस्तान ने किसी ना किसी चैनल से उसका वीडियो जरूर दिखाना था लेकिन क्योंकि हाफिज सईद और अज़हर मसूद की प्रेरणा और भारतीय वायु सेना के सहयोग के चलते वह सभी बगैर पासपोर्ट जन्नत की हूरों के पास पहुंच चुके थे इसलिए पाकिस्तान के पास उनको जेहादी जन्नत से वापस लाने का कोई भी जरिया नहीं था।
अब पाकिस्तान की आर्मी द्वारा भाड़े पर लिए गए कुछ पत्रकार ढिंढोरा पीट रहे हैं कि बालाकोट में कोई भी दहशतगर्द मारा नहीं गया,जबकि असलियत यह है कि भारतीय सेना द्वारा किए गए इस सटीक ऑपरेशन में जितने भी दहशतगर्दी को निशाना बनाया गया था वो सभी इस समय सुराही दार गर्दन, पारदर्शी जिस्म वाली, नशीली, लटके झटकेदार कमसिन हूरों के साथ जिहादियों द्वारा निर्मित जन्नत में झूला झूल रहे हैं और भारतीय वायु सेना का शुक्रिया अदा कर रहे हैं जिसने उनको आवागमन के चक्कर से निजात दिला कर जेहादी जन्नत में परमानेंट ऐश करने का सुनहरा मौका मुहैया करवाया।


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