पाकिस्तान से मदद लेकर 2020 तक खालिस्तान बनाने का शेखचिल्ली ब्रांड सपना देख रहे कथित सिख संगठन पाकिस्तान द्वारा सिखों पर हुए जुल्मो सितम को भूल गए हैं । जिनमें से विदेशों में ऐशो इशरत की ज़िंदगी बिताने वाले ज्यादातर घोने मोने गुरु कलगीधर पातशाह द्वारा बख्शी गई केशों की दात से भी किनारा करते हुए उस्तरे के सामने सिर झुका कर मुण्डन करवा चुके हैं।
इन तथाकथित विदेशी सिख संगठनों का कार्य गुरु नानक या सिख पंथ की मान्यताओं का प्रचार प्रसार कम, उनके नाम पर अलगाववादी राजनीति करना ज्यादा होता है। पाकिस्तानी एजंट गोपाल सिंह चावला उर्फ गप्पू उर्फ चवल जैसे लोग विदेशों और ISI से मिलने वाले पैसे के बदले हाफ़िज़ सईद को समर्थन दे तो इसमें कौन सी बड़ी बात हैं।
ध्यान दीजिये, ये सिख संगठन वही हैं, जिन्होंने 26 जनवरी, 2018 को भारतीय दूतावास के बाहर पाकिस्तानी मुसलमानों के साथ मिलकर कश्मीर और खालिस्तान की आज़ादी के मांग के नारे लगाए थे। इन्हीं अलगावादी लोगों के विरोध में देशभक्त भारतीयों ने “भारत माता की जय” और “वन्देमातरम” इसी दूतावास के सामने लगाए थे।
सिख संगत में बहुसंख्यक सिख भारत के साथ हैं और रहेंगे। कुछ चावला जैसे पाकिस्तानी वेतन भोगी नकली सिख अलगावाद की बात करते हैं। ये लोग न केवल अपने गुरुओं के बलिदान का इतिहास भूल जाते है अपितु अपना वर्तमान भी भूल जाते हैं। पाकिस्तान में रहने वाले सिखों के साथ पाकिस्तानी मुसलमान कैसा बर्ताव करते हैं? कश्मीर में रहने वाले सिखों का नरसंहार भी ये लोग भूल जाते है?
सबसे महत्वपूर्ण 1947 में पाकिस्तान बनने पर हिन्दुओं और सिखों का कैसा नरसंहार हुआ था। इसे तो अपने बच्चों को ये लोग कभी बताना ही नहीं चाहते। इस लेख के माध्यम से उसी भूले जा चुके इतिहास को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जायेगा कि 1947 में पाकिस्तान में रहने वाले मुसलमानों ने कैसे हमारी सिख नस्लों को तबाह किया था।
यह लेख हर सिख को पढ़ना चाहिए क्योंकि इसे पढ़कर विदेश में रहने वाले सभी सिखों को अपने सच्चे इतिहास का ज्ञान होगा।

हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बंटवारे के बाद भारत सरकार ने एक फैक्ट फाइंडिंग संगठन बनाया, जिसका कार्य था पाकिस्तान छोड़कर भारत आये लोगों से उनकी जुबानी अत्याचारों की गाथा सुनकर उन घटनायों का लेखा-जोखा बनाना। इसी लेखा-जोखा के आधार पर गांधी हत्याकांड की सुनवाई कर रहे उच्च न्यायालय के जज जी डी खोसला लिखित, 1949 में प्रकाशित, पुस्तक ‘स्टर्न रियलिटी’ भारत विभाजन के समय पाकिस्तान में हुए दंगों, कत्लेआम, हताहतों की संख्या और राजनैतिक घटनाओं को दस्तावेजी स्वरूप प्रदान करती है। हिंदी में इसका अनुवाद और समीक्षा ‘देश विभाजन का खूनी इतिहास (1946-47 की क्रूरतम घठनाओं का संकलन)’ नाम से सच्चिदानंद चतुर्वेदी ने किया है।

नीचे दी हुयी चंद दर्दनाक और अमानवीय घटनायें इसी पुस्तक से ली गई हैं जो ऊंट के मुंह में जीरा समान हैं।

★ 11 अगस्त 1947 को सिंध से लाहौर स्टेशन पह़ुंचने वाली सिखों और हिंदुओं से भरी गाड़ियां खून का कुंड बन चुकी थीं। अगले दिन सिख हिंदुओं का रेलवे स्टेशन पहुंचना भी असंभव हो गया। उन्हें रास्ते में ही पकड़कर कत्ल किया जाने लगा। इस नसलकुशी में बलूच रेजिमेंट ने प्रमुख भूमिका निभाई। 14 और 15 अगस्त को रेलवे स्टेशन पर अंधाधुंध नरसंहार का दृश्य था। एक गवाह के अनुसार स्टेशन पर गोलियों की लगातार वर्षा हो रही थी। मिलिट्री ने सिख हिंदुओं को स्वतंत्रता पूर्वक खुले आम गोलियाँ मारी और इज्जत और पैसा लूटा।

★ 19 अगस्त तक लाहौर शहर के तीन लाख सिख हिन्दू घटकर मात्र दस हजार रह गये थे। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति वैसी ही बुरी थी। पट्टोकी में 20 अगस्त को धावा बोला गया जिसमें ढाई सौ सिख हिंदुओं की हत्या कर दी गई। सिख हिंदुओं की दुकानों को लूटकर उसमें आग लगा दी गई। इस आक्रमण में बलूच मिलिट्री ने भाग लिया था।

★ 25 अगस्त की रात के दो बजे शेखपुरा शहर जल रहा था। मुख्य बाजार के हिंदू और सिख दुकानों को आग लगा दी गई थी। सेना और पुलिस घटनास्थल पर पहुंची। आग बुझाने के लिये अपने घर से बाहर निकलने वालों को गोली मारी जाने लगी। उपायुक्त घटनास्थल पर बाद में पहुंचा। उसने तुरंत कर्फ्यू हटाने का निर्णय लिया और उसने और पुलिस ने यह निर्णय घोषित भी किया। लोग आग बुझाने के लिये दौड़े। पंजाब सीमा बल के बलूच सैनिक, जिन्हें सुरक्षा के लिए लगाया गया था, सिख हिंदुओं पर गोलियाँ बरसाने लगे। एक घटनास्थल पर ही मर गया, दूसरे सिख हकीम लक्ष्मण सिंह को रात में ढाई बजे मुख्य गली में जहाँ आग जल रही थी, गोली लगी। अगले दिन सुबह सात बजे तक उन्हें अस्पताल नहीं ले जाने दिया गया। कुछ घंटों में उनकी मौत हो गई।

★ गुरुनानक पुरा में 26 अगस्त को हिंदू और सिखों की सर्वाधिक सुनियोजित हत्या की कार्यवाही हुई। मिलिट्री द्वारा अस्पताल में लाये जाने सभी घायलों ने बताया कि उन्हें बलूच सैनिकों द्वारा गोली मारी गयी या 25 या 26 अगस्त को मिल्ट्री की मौजूदगी में मुस्लिम झुंड द्वारा छूरा या भाला मारा गया। घायलों ने यह भी बताया कि बलूच सैनिकों ने सुरक्षा के बहाने हिंदू और सिखों को चावल मिलों में इकट्ठा किया। इन लोगों को इन स्थानों में जमा करने के बाद बलूच सैनिकों ने पहले उन्हें अपने कीमती सामान देने को कहा और फिर निर्दयता से उनकी हत्या कर दी। घायलों की संख्या चार सौ भर्ती वाले और लगभग दो सौ चलंत रोगियों की हो गई। इसके अलावा औरतें और सयानी लड़कियाँ भी थीं जो सभी प्रकार से नंगी कर दी गई थीं। सर्वाधिक प्रतिष्ठित घरों की महिलाएं भी इस भयंकर दु:खद अनुभव से गुजरी थीं। एक एडवोकेट की पत्नी जब अस्पताल में आई तब उसके शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं था। मारे गए पुरुष और महिला की संख्या बराबर थी। हताहतों में एक सौ से ज्यादा घायल बच्चे भी थे।

★ शेखपुरा में 26 अगस्त की सुबह सिख नेता सरदार आत्मा सिंह की मिल में करीब सात आठ हजार सिख हिंदु शरणार्थी शहर के विभिन्न भागों से भागकर जमा हुये थे। करीब आठ बजे मुस्लिम बलूच मिलिट्री ने मिल को घेर लिया। उनके फायर में मिल के अंदर की एक औरत की मौत हो गयी। उसके बाद कांग्रेस समिति के अध्यक्ष सरदार आनंद सिंह मिलिट्री वालों के पास हरा झंडा लेकर गये और पूछा आप क्या चाहते हैं। मिलिट्री वालों ने दो हजार छ: सौ रुपये की मांग की जो उन्हें दे दिया गया। इसके बाद एक और फायर हुआ ओर एक आदमी की मौत हो गई। दोबारा सरदात आनंद सिंह द्वारा फायर ना करने के निवेदन पर बारह सौ रुपये की मांग हुयी, जो उन्हें दे दिया गया। फिर तलाशी लेने के बहाने सबको बाहर निकाला गया। सभी सात-आठ हजार शरणार्थी बाहर निकल आये। सबसे अपने कीमती सामान एक जगह रखने को कहा गया। थोड़ी ही देर में सात-आठ मन सोने का ढेर और करीब तीस-चालीस लाख जमा हो गये। मिलिट्री द्वारा ये सारी रकम उठा ली गई। फिर वो सुंदर सिख हिन्दू लड़कियों की छंटाई करने लगे। विरोध करने पर सिख नेता सरदार आनंद सिंह को गोली मार दी गयी। तभी एक बलूच सैनिक द्वारा सभी के सामने एक लड़की को छेड़ने पर एक शरणार्थी ने सैनिक पर वार किया। इसके बाद सभी बलूच सैनिक शरणार्थियों पर गोलियाँ बरसाने लगे। अगली पांत के शरणार्थी उठकर अपनी ही लड़कियों की इज्जत बचाने के लिये उनकी हत्या करने लगे।

★ 1अक्टूबर की सुबह सरगोधा से पैदल आने वाला सिख हिंदुओं का एक बड़ा काफिला लायलपुर पार कर रहा था। जब इसका कुछ भाग रेलवे फाटक पार कर रहा था अचानक फाटक बंद कर दिया गया। हथियारबंद मुसलमानों का एक झुंड पीछे रह गये काफिले पर टूट पड़ा और बेरहमी से उनका कत्ल करने लगा। रक्षक दल के बलूच सैनिकों ने भी उनपर फायरिंग शुरु कर दी। बैलगाड़ियों पर रखा उनका सारा धन लूट लिया गया। चूंकि आक्रमण दिन में हुआ था, जमीन लाशों से पट गई। उसी रात खालसा कालेज के शरणार्थी शिविर पर हमला किया गया। शिविर की रक्षा में लगी सेना ने खुलकर लूट और हत्या में भाग लिया। खालसा कालेज में भारी संख्या में सिख हिंदुओं मार डाले गये और अनेक युवा सिख हिन्दू लड़कियों को उठा लिया गया और बंधक बनाकर बलात्कार किये गए ।

★ अगली रात इसी प्रकार आर्य स्कूल शरणार्थी शिविर पर हमला हुआ। इस शिविर के प्रभार वाले बलूच सैनिक अनेक दिनों से सिख हिंदु शरणार्थियों को अपमानित और उत्पीड़ित कर रहे थे। नगदी और अन्य कीमती सामानों के लिये वो बार-बार तलाशी लेते थे। रात में सिख हिंदु महिलाओं को उठा ले जाते और बलात्कार करते थे। 2 अक्टूबर की रात को विध्वंश अपने असली रूप में प्रकट हुआ। शिविर पर चारों ओर से बार-बार हमले हुये। सेना ने शरणार्थियों पर गोलियाँ बरसाईं। शिविर की सारी संपत्ति लूट ली गई। मारे गये लोगों की सही संख्या का आकलन संभव नहीं था, क्योंकि ट्रकों में बड़ी संख्या में लादकर शवों को रात में चेनाब में फेक दिया गया था।

★ करोर में सिख हिंदुओं का भयानक नरसंहार हुआ। 70 सितंबर को जिला के डेढ़ेलाल गांव पर मुसलमानों के एक बड़े झुंड ने आक्रमण किया। सिख हिंदुओं ने गांव के नँबरदार के घर शरण ले ली। प्रशासन ने मदद के लिये दस बलूच सैनिक भेजे। सैनिकों ने सबको बाहर निकलने के लिये कहा। वो औरतों को पुरूषों से अलग रखना चाहते थे। परंतु दो सौ रूपये घूस लेने के बाद औरतों को पुरूषों के साथ रहने की अनुमति दे दी। रात मे सैनिकों ने हिंदु और सिखों की औरतों से बलात्कार किया। 9 सितंबर को सबसे इस्लाम स्वीकार करने को कहा गया। लोगों ने एक घर में शरण ले ली। बलूच सैनिकों की मदद से मुसलमानों ने घर की छत में छेद कर अंदर किरोसिन डाल आग लगा दी। पैंसठ लोग जिंदा जल गये।

ये तो केवल कुछ प्रमाण है। पाकिस्तान में हिन्दुओं और सिखों के साथ हुई ऐसी असंख्य घटनाएं हैं। हम आज भी जीवित प्रत्यक्षदर्शियों से सुन सकते हैं। क्या अलगावादी सिखों को इस भयानक कड़वे और खून खौला देने वाले रक्त रंजित इतिहास को स्वीकार कर अपना पक्ष नहीं बदलना चाहिए? पर नहीं उनके लिए तो एक ही मुहावरा सटीक बैठता है।

“बाप बड़ा न भैइया सबसे बड़ा रुपैया”

अभी किस्से और भी हैं मुसलमान शासकों द्वारा श्री गुरु गोविंद सिंह के बच्चों के कत्लेआम और श्री गुरु गोविंद सिंह की धोखे से की गई हत्या के । जिन्हें भूला नहीं जा सकता और मुसलमान शासकों द्वारा सिख गुरुओं पर किये गए असहनीय अत्यचारों की गाथा सुनकर पत्थर भी पिघल जाते हैं और आंखें छलक पड़ती हैं लेकिन अय्याशियों की चकाचौंध के चलते पाकिस्तानी दलालों के दिलो दिमाग सुन्न हो चुके हैं और भावनाएं मर चुकी हैं ।


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