महाभियोग क्यूँ गिरा औंधे मुंह

उपराष्ट्रपति और राज्य सभा के सभापति वेंकैया नायडू ने लंबे विचार विमर्श के बाद चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष के महाभियोग प्रस्ताव को खारिज कर दिया। उपराष्ट्रपति ने अपने 10 पेज के आदेश में विपक्ष के तमाम आरोपों को निराधार बताते हुए 22 कारण बता कहा कि वह चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग की इजाजत नहीं दे सकते हैं। आइए जानते हैं राज्य सभा के सभापति नायडू ने अपने आदेश में क्या-क्या कहा…

1-इस नोटिस पर 64 सदस्यों के हस्ताक्षर थे। इसके लिए जज इन्क्वायरी ऐक्ट के सेक्शन 3(1) के तहत विचार करने की जरूरत थी। बता दें कि इस ऐक्ट के तहत जजों पर लगे किसी प्रकार के आरोप की जांच होती है। चूंकि विपक्ष ने पर्याप्त संख्याबल के साथ महाभियोग का नोटिस राज्य सभा के सभापति को सौंपा था इसलिए नायडू ने इसके लिए सभी से चर्चा की।

सभापति ने की सबसे चर्चा

2-चूंकि यह प्रस्ताव सीधे चीफ जस्टिस के खिलाफ था तो इस मामले में उनसे कोई कानूनी राय नहीं ली जा सकती थी। मैंने इसके लिए कानून के विशेषज्ञ, संविधान विशेषज्ञों और राज्य सभा और लोकसभा के पूर्व महासचिवों से चर्चा की। पूर्व लॉ अधिकारियों, लॉ कमिशन के सदस्यों और मशहूर न्यायविदों से भी चर्चा की।

हर पहलू पर हुई चर्चा

3-मैंने संविधान के प्रस्तावों और जजों को हटाने के मौजूदा प्रावधानों का भी अध्ययन किया। पूरी जांच परख के बाद मैं इस बात से सहमत हूं कि यह नोटिस सही नहीं है।

4-सांसदों ने अपने प्रस्ताव में हो सकता है, ऐसा प्रतीत होता है। मैं इसे कल्पना मानता हूं। इन आरोपों के साथ सबूत नहीं हैं। ये सभी निराधार हैं।

5-मैंने कानून के जानकारों कई लोगों से इस प्रस्ताव पर विस्तृत चर्चा की। मैंने हर आरोप पर निजी तौर पर विचार किया। पूरे विचार विमर्श के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

न्यायपालिका में लोगों के भरोसा का रखें ध्यान
 6-रोस्टर बंटवारा भी सुप्रीम को चीफ जस्टिस का अधिकार है और वह मास्टर ऑफ रोस्टर होते हैं। हाल के कामिनी जायसवाल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के मामले में 14 नवंबर 2017 को 5 जजों की पीठ ने टिप्पणी की थी कि चीफ जस्टिस फर्स्ट अमंग इक्वल हैं। जहां तक रोस्टर का संबंध है तो इस बारे में चीफ जस्टिस के पास बेंच का गठन करने और केसों का बंटवारा करने का अधिकार है। साफ है कि यह कोर्ट का अंदरूनी मामला है और कोर्ट इसपर खुद ही फैसला कर सकती है। विपक्ष के 5 आरोपों को पढ़ने के बाद मेरा मानना है कि ये आरोप स्वीकर नहीं किए जा सकते हैं। इस तरह के आरोपों से न्यायपालिका की स्वतंत्रता को ठेस पहुंचती है, जो भारतीय संविधान की मूल भावना है।

7-मैंने हर आरोप पर खुद विचार किया। मैंने प्रस्ताव के साथ शामिल हर कागजात का अध्ययन किया। मेरा साफ मानना है कि इन कागजातों के आधार पर चीफ जस्टिस दुर्व्यवहार के दोषी नहीं करार दिए जा सकते हैं।

8-देश के सुप्रीम कोर्ट के सर्वोच्च अधिकारी के खिलाफ इस तरह का फैसला लेने से पहले विपक्ष को इसपर बारीकी से सोचना चाहिए था। क्योंकि इस तरह के प्रस्ताव से आम लोगों का न्यायपालिका में भरोसा घटता है।

9-इस तरह के प्रस्ताव के लिए एक पूरी संसदीय परंपरा है। राज्य सभा के सदस्यों के हैंडबुक के पैराग्राफ 2.2 में इसका उल्लेख है। यह पैराग्राफ इस तरह के नोटिस को पब्लिक करने से रोकता है। इस मामले में मुझे यह नोटिस सौंपते ही 20 अप्रैल को सदस्यों ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला ली और कॉन्टेंट को शेयर किया। यह संसद के परंपरा के खिलाफ था। इस कारण मुझे तुरंत फैसला लेना पड़ा ताकि इस मामले में अटकलों पर रोक लगे।

10-सभी तथ्यों पर विचार के बाद मैं इस नोटिस को मंजूर नहीं कर रहा हूं।


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