स्टेंट के रेट कम फिर भी लुट रहे हार्ट पेशेंट्स

स्टेंट के रेट कम होने के बाद भी ऐसे कट रही है हार्ट पेशेंट्स की जेब 

स्टेंट के रेट कम फिर भी लुट रहे हार्ट पेशेंट्स

स्टेंट के रेट कम फिर भी लुट रहे हार्ट पेशेंट्स केंद्र सरकार ने स्टेंट की कीमत पर कैपिंग (रेट फिक्स) का फैसला इसलिए लिया था
ताकि मरीजों पर इसके खर्च का बोझ कम हो सके.
लेकिन हुआ उलट. सरकार ने स्टेंट के रेट कंट्रोल कर दिए हैं.
इसके बाद से जेनरेशन 1 और 2 वाले स्टेंट के रेट निर्धारित हो गए हैं.

बावजूद इसके मरीजों की जेब काटने और मुनाफे में कमी को दूर करने के लिए प्राइवेट अस्पतालों ने कमाई का जरिया तलाश लिया है.

ज्यादातर प्राइवेट अस्पताल ने प्रोसीजर फीस बढ़ा दी है.

प्राइवेट अस्पताल स्टेंट लगाने पर अब ढाई लाख रुपये से लेकर तीन लाख रुपये तक के बिल बना रहे हैं.
जबकि एम्स और जीबी पंत जैसे सरकारी अस्पताल में ये ही स्टेंट लगाने पर कुल खर्च 23 से 45 हजार रुपये तक आ रहा है.

दिल्ली सरकार के अस्पताल जीबी पंत में एम्स से कम सिर्फ 23,625 रुपये में स्टेंट लगाया जा रहा है.

इस अस्पताल में बाकी सारी सुविधाएं फ्री हैं.

एक सरकारी अस्पताल के कार्डियोलॉजिस्ट डॉक्टर सुंदर मिश्रा का कहना है कि स्टेंट के रेट को कंट्रोल करने का प्रयास सही है.

इससे प्राइवेट अस्पतालों की कमाई कम हो गई है, लेकिन उसे उन्होंने पैकेज रेट बढ़ा कर पूरा कर लिया है.

डॉक्टर मिश्रा का कहना है कि आज भी प्राइवेट अस्पताल का पैकेज दो से तीन लाख के बीच है.

कुछ अस्पतालों में इससे भी ज्यादा है.
एम्स में खर्च बहुत ही कम है.
डॉक्टर ने कहा कि एम्स में स्टेंट पर केवल 25 हजार रुपये लिए जाते हैं, यह रेट पिछले तीन चार साल से है.

कैपिंग से पहले ही एम्स में सस्ते स्टेंट लगाए जा रहे हैं.

डॉक्टर ने बताया कि स्टेंट के अलावा जो एक्सेसरीज लगती हैं, उस पर एम्स के मरीज को 10 से 12 हजार रुपये लगते हैं.

40 से 42 हजार में एंजियोप्लास्टी हो जाती है.

डॉक्टर ने कहा कि औसतन पूरे साल में 1200 प्रोसीजर होता है और इसमें से 1800 से 2000 स्टेंट लगते हैं.
स्टेंट इमरजेंसी की स्थिति में लगाए जाते हैं,

इसलिए ज्यादा वेटिंग नहीं है. एक हफ्ते से ज्यादा किसी मरीज को टाइम नहीं दिया जाता है.

जीबी पंत के कार्डियोलॉजिस्ट ने बताया कि साल 2011 से अस्पताल में 22,500 रुपये वाला स्टेंट लग रहा है.

टैक्स के साथ इसका रेट 23625 रुपये हो जाता है. उन्होंने कहा कि सस्ता होने के चलते सबसे ज्यादा एंजियोप्लास्टी जीबी पंत में हो रही है.

हर महीने यहां पर 1000 से 1200 स्टेंट लग रहे हैं.

किसी भी एक सेंटर में इतना प्रोसीजर नहीं हो रहा है. डॉक्टर ने कहा कि यहां पर एंजियोप्लास्टी में वही तरीका अपनाया जाता है,

जो प्राइवेट में होता है.
अस्पताल में केवल स्टेंट का पैसा लिया जाता है, बाकी सभी सामान का पैसा सरकार देती है.

आइए ऐसे समझते हैं मरीजों को लग रही चपत को 

साल 2016 में एक मरीज को हार्ट अटैक आया. उसे स्टेंट लगाया गया. इलाज पर 2 लाख 36 हजार रुपये खर्च हुए.
इसमें स्टेंट की कीमत एक लाख 10 हजार रुपये थी. इलाज के प्रोसीजर का खर्च एक लाख 26 हजार रुपये रहा.
इसी मरीज को दोबारा अटैक आया. अब स्टेंट के रेट फिक्स हो चुके थे. मरीज उसी अस्पताल में इलाज के लिए पहुंचा.

उसे लगा कि इस बार खर्च कम आएगा, क्योंकि कैपिंग के बाद स्टेंट लगवाना सस्ता हो गया है. हुआ भी ऐसा ही. मरीज को एक स्टेंट लगा.

खर्च आया 1.96500 लाख रुपये. मरीज खुश था. लेकिन वह समझ नहीं पाया कि नुकसान कहां हुआ.

दरअसल, मरीज से एक लाख दस हजार रुपये की जगह स्टेंट के लिए 27500 हजार रुपये लिए गए.
जबकि अस्पताल ने प्रोसीजर और अन्य खर्च के नाम पर उनसे एक लाख 69 हजार रुपये वसूल किए.
जबकि पिछली बार इसी मरीज से प्रोसीजर और अन्य खर्च के नाम पर 1.26 लाख रुपये लिए गए थे.
यानी अस्पताल ने एक साल के अंतराल में ही प्रोसीजर के खर्च पर 43 हजार रुपये बढ़ा दिए. तो यह है स्टेंट पर लगी कैपिंग की हकीकत.

स्टेंट के रेट घटने के बाद एक अस्पताल में इलाज का खर्च

कंस्लटेंसी : 22,00

एंजियोप्लास्टी : 1,55,650

बैलून : 22,000

गाइड वॉयर : 18,000

मेडिकेटेड स्टेंट : 62,160

अन्य खर्च : 32,000

कुल खर्च : 2,92,010

(कैपिंग के बाद कंस्लटेंसी फीस बढ़ गई है. एंजियोप्लास्टी के 13 हजार रुपये लिए जाते थे.

बैलून पर पहले न के बराबर फीस ली जाती थी. लेकिन अब इसे भी बिल में शामिल कर दिया गया है. प्रोसीजर रेट बढ़ाए गए हैं.)

स्टेंट सस्ता होने पर ऐसे तलाशा कमाई का रास्ता

जीबी पंत अस्पताल से रिटायर्ड डॉक्टर संजय श्रीवास्तव बताते हैं कि स्टेंट बनाने वाली कंपनियां प्राइवेट अस्पतालों को काफी कम रेट में स्टेंट देती थीं. अस्पताल महंगे रेट में बेच कर खूब मुनाफा कमा रहा थे. कंपनी से ज्यादा स्टेंट से अस्पतालों की कमाई हो रही थी.कैपिंग से अस्पतालों की कमाई रुक गई है, इसलिए अब अस्पतालों ने प्रोसीजर रेट बढ़ा दिए. अगर किसी को एक स्टेंट लगता है तो उन्हें कोई फायदा नहीं है. डॉक्टर ने कहा कि जो बैलून प्राइवेट अस्पताल में 18 से 22 हजार के बीच है वह सरकारी अस्पतालों में 5 हजार रुपये में दिए जाते हैं.

ये बात सही है कि कैंपिक के बाद स्टेंट के रेट कम हो गए हैं, लेकिन परेशानी ये है कि इसके बाद प्राइवेट अस्पतालों की निगरानी नहीं हो रही है.

स्टेंट लगाने का खर्च अलग-अलग अस्पतालों में

एम्सस्टेंट -25 हजार

ऐक्सेसरीज -10 से 12 हजार

कुल खर्च- 40 से 42 हजार

जीबी पंत अस्पताल

– स्टेंट -23,625 रुपये

– बाकी सभी ऐक्सेसरीज अस्पताल में फ्री है

– कुल खर्च – 23625 रुपये

एक बड़ा प्राइवेट अस्पताल

कंसल्टेंसी – 2,200एंजियोप्लास्टी – 1,55,650

बैलून – 22,000

गाइड वायर – 18,000

मेडिकेटेड स्टेंट – 62,160

अन्य खर्च – 32,000

कुल खर्च – 2,92,010

इस पर क्या कहते हैं प्राइवेट अस्पताल 

मेदांता अस्पताल में कार्डियोलॉजी के डॉ प्रवीण चंद्रा का कहना है कि स्टेंट के रेट जेनरेशन और क्वालिटी के हिसाब से तय होते हैं.
बाजार में पहली दो जेनरेशन से भी अच्छी गुणवत्ता के स्टेंट मौजूद हैं. जाहिर सी बात है इनकी कीमत भी कुछ ज्यादा ही है.
ऐसे में जब मरीज हमसे एडवांस जेनरेशन वाले स्टेंट की मांग करता है तो हम उसे वहीं देंगे.
रहा सवाल प्रोसीजर फीस बढ़ने का तो ये बाजार के हिसाब से तय होती है.
बाजार में जो सामान जितने का मिलेगा उसी हिसाब से रेट लिए जाएंगे. और बाजार में उतार-चढ़ाव लगे रहते हैं.

आर्टरी की रुकावट को खोलने के लिए इस्तेमाल होता है स्टेंट

कार्डियक स्टेंट पतले तार से बना होता है. इसका इस्तेमाल दिल तक खून ले जाने वाली आर्टरी को खोलने के लिए किया जाता है.
इसकी सबसे ज्यादा जरूरत बाईपास सर्जरी और किडनी से जुड़ी समस्याओं में पड़ती है.

हाईकोर्ट के आदेश पर उठाया था यह कदम

मालूम हो, दिल्ली हाई कोर्ट ने 23 दिसंबर 2016 को केंद्र सरकार को 1 मार्च 2017
तक स्टेंट का अधिकतम बिक्री मूल्य तय करने का निर्देश दिया था.
कोर्ट ने यह आदेश वीरेन्द्र सांगवान की याचिका पर दिया था.
दरअसल, 19 जुलाई 2016 को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने अधिसूचना जारी कर
स्टेंट को राष्ट्रीय आवश्यक दवा सूची में शामिल किया था.
इससे स्टेंट सस्ता होने के साथ ही इसकी कीमत भी तय होना थी.
ऐसा न होने पर ही सांगवान ने हाई कोर्ट से अपील की थी.

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