महिला फंस गई बिना शौचालय की ट्रेन में

उस सवारी गाड़ी में एक भी शौचालय नहीं था

उस सवारी गाड़ी में एक भी शौचालय नहीं था लंबी दूरी की उस सवारी गाड़ी में एक भी शौचालय नहीं था।

ऐसे में बतौर महिला यात्री टॉयलेट जाने की साधारण सी इच्छा आगे यातनाओं के एक लंबे सफर में तब्दील हो गई.

बिना शौचालय की ट्रेन और यातना में बदला सफर
कोई भी ट्रेन अगर 160 किमी से अधिक दूरी तय करती है और उसकी यात्रा अवधि 4 घंटों से ज्यादा है तो उसमें शौचालय होना ही चाहिए.

अक्षय कुमार और भूमि पेडणेकर की फिल्म ‘टॉयलेट एक प्रेमकथा’ इन दिनों चर्चा में है.

यह मसाला फिल्म तो है, लेकिन आम मसाला फिल्म नहीं.

आलोचकों की राय भले ही जुदा हो लेकिन दर्शकों को फिल्म पसंद आ रही है.

तभी तो शुरुआती पांच दिनों में ही फिल्म 100 करोड़ क्लब के करीब पहुंच चुकी है.

फिल्म में नायक के घर पर शौचालय नहीं है और मर्दवादी सोच के साथ पला बढ़ा हीरो कभी इस बारे में सोचता भी नहीं.

उसकी आंखें तब खुलती हैं जब उसका ब्याह होता है और नवविवाहिता पत्नी कहती है कि वह खेतों में ‘लोटा पार्टी’ की मेंबर बनकर नहीं जाएगी,

उसे शौचालय चाहिए. फिल्म कई रोचक उतारचढ़ाव के साथ सुखद अंजाम को पहुंचती है,

लेकिन यहां मेरा मकसद इस फिल्म पर बात करना नहीं

बल्कि इस फिल्म के बहाने स्मृति में कौंध गई एक भयावह याद से आपको रूबरू कराना है.

वाकया पिछले साल का है जब मैं एक ऐसी ट्रेन में फंस गई थी जिसमें शौचालय ही नहीं था.

‘टॉयलेट एक प्रेमकथा’ का हीरो घर पर शौचालय न होने पर अपनी पत्नी को गांव के स्टेशन पर रुकने वाली

उस गाड़ी में शौच करने के लिए ले जाता है जो वहां पूरे 7 मिनट रुकती है.

लेकिन सोचिए क्या हो अगर आपको किसी ट्रेन में करीब 5-6 घंटे का सफर करना हो और उसमें शौचालय ही न हो?

यह कल्पना भले ही बहुत अजीब न लग रही हो, मन में ख्याल आ रहा हो कि अरे 5-6 घंटे की तो बात है,

शौचालय नहीं था तो भी क्या हुआ…अगर वाकई ऐसा है तो मेरी यही कामना है कि

आप कभी उस स्थिति में न फंसें जिससे मुझे दो-चार होना पड़ा था.

टॉयलेट एक प्रेमकथा

बात पिछले साल की है. मुझे एक स्टोरी के सिलसिले में भोपाल से झाबुआ जाना था.

झाबुआ मेरे लिए अनजाना इलाका था और इस प्यारे से आदिवासी बहुल जिले को लेकर

लोगों ने मेरे मन में इतने भ्रम डाल दिए कि मैंने अपनी कार से जाने के बजाय ट्रेन जैसा सुरक्षित माध्यम चुनना बेहतर समझा.

मैं एक शाम पहले भोपाल से उज्जैन पहुंची और एक मित्र के घर पर रात गुजारी.

अलसुबह उन्होंने मुझे उज्जैन से वाया रतलाम, मेघनगर, दाहोद को जाने वाली यात्री गाड़ी में बिठा दिया.

चूंकि मैं अपनी बॉडी क्लॉक के हिसाब से काफी जल्दी उठ गई थी

इसलिए मैं ठीक से फ्रेश भी नहीं हो पाई और आकर उनींदी सी ट्रेन में बैठ गई.

यह एक पैसेंजर ट्रेन थी, जिसकी अपनी अलग सवारियां और अपनी अलग गति होती है.

ट्रेन में सवारियां तो थीं ही साथ ही, दूध के डोले, मुर्गियां,बकरियां सब सहयात्री होने का आनंद दे रहे थे.

यह अपनी तरह का पहला अनुभव था जिसका मैं खूब लुत्फ ले रही थी.

ट्रेन ने अभी कुछ एक स्टेशनों का ही सफर तय किया था कि मुझे शौचालय जाने की इच्छा महसूस हुई.

मैं उठकर दो डिब्बों के जोड़ वाले स्थान पर पहुंची.

मुझे यह देखकर झटका लगा कि ट्रेन में कोई शौचालय ही नहीं है. मुझे

मेघनगर उतरकर वहां से झाबुआ की बस पकडऩी थी.

मेरे लिए अभी दिल्ली दूर थी और टॉयलेट जाने का दबाव बढ़ता जा रहा था.

बीच के स्टेशनों पर ट्रेन रुकती भी थी, लेकिन इतना अधिक समय नहीं था कि मैं भागकर जाऊं और निपटकर आ जाऊं.

मेरी सहयात्री ग्रामीण महिलाओं को मेरी उलझन समझ में आ गई थी.

उन्होंने सुझाव दिया कि वे ट्रेन के गेट पर मेरे इर्दगिर्द घेरा बना लेंगी और मैं चलती ट्रेन के दरवाजे पर निपट लूं.

मुसीबत दर मुसीबत 

मैंने यह सुझाव सिरे से नकार दिया. इस बीच ट्रेन रतलाम स्टेशन पहुंच गई थी.

अब तक मेरा टॉयलट न जा पाना ‘अखिल बोगी’ की समस्या बन चुका था.

लोगों ने मुझे बताया कि ट्रेन यहां कुछ देर रुकेगी. मैं भागकर ट्रेन से उतरी और प्लेटफॉर्म पर बने शौचालय के दरवाजे तक पहुंची…

लेकिन उसे दरवाजा कहा ही नहीं जा सकता था.

भीतर इतनी गंदगी कि सांस लेना मुहाल. मैंने एक बार मुड़कर ट्रेन की ओर देखा और स्टेशन से बाहर की ओर भागी.

 रतलाम एक छोटा सा स्टेशन था. शायद नई जगह होने के चलते दूर-दूर तक कुछ नजर नहीं आ रहा था.

पहले सोचा झाड़ियों में बैठ जाऊं, लेकिन उस समय तक सरकार का स्वच्छता अभियान चालू हो चुका था,

डर लग रहा था कि कहीं कोई सरकारी कर्मचारी कैमरा लिए मुस्तैद न हो.

खैर, स्टेशन से खासा दूर कई दरवाजे खटखटाने के बाद आखिकरकार एक परिवार का दिल पसीजा

और उन्होंने मुझे अपने घर का शौचालय इस्तेमाल करने दिया.

इस मोर्चे से निपटने के बाद दूसरी समस्या याद आई.

मेरी ट्रेन तो अब तक स्टेशन से जा चुकी होगी.

मुझे अगले कुछ घंटों में हर हाल में झाबुआ पहुंचना था.

जहां तक मुझे याद आ रहा है, शायद अगली ट्रेन के आने में बहुत ज्यादा वक्त था, या शायद उस दिन और कोई ट्रेन ही नहीं थी जो मेघनगर रुकती.

टैक्सी वाले रतलाम से मेघनगर तक 90 किलोमीटर ले जाने के लिए 2000-2500 रुपये मांग रहे थे.

अनजान शहर का वीरान सा रेलवे स्टेशन

मैंने 1000 रुपये तक देने की हिम्मत भी जुटाई लेकिन वे तैयार नहीं हुए. सर पर कड़ी धूप और एक अनजान शहर का वीरान सा रेलवे स्टेशन.

मुझे कई फिल्मी दृश्य याद आ रहे थे जो जाहिर है सुखद नहीं थे.

मैंने तुरंत फैसला लिया और बस स्टैंड पहुंची. वह एक लोकल बस थी जो मेघनगर तक जा रही थी.

धूल-पसीने-बीड़ी और शराब की मिलीजुली उबकाई लाने वाली गंध के बीच मेघनगर तक का 90 किमी का सफर मैंने करीब चार घंटे में तय किया.

यह पूरा सफर एक ऐसी यातना थी जिसे मैं चाहकर भी भूल नहीं सकती.

मैं रेलवे पर बहुत गुस्सा थी. मुझे लगा इस कदर अमानवीयता कैसे बरती जा सकती है.

इतनी लंबी सवारी गाड़ी बिना शौचालय के कैसे चलाई जा सकती है. मेरा सफर कुछ बुरी स्मृतियों का रहा

लेकिन पता नहीं ऐसे हालात में किस-किस के साथ क्या, क्या हो सकता है?

क्या होता अगर सफर दिन के बजाय रात का होता और मैं ऐसे ही किसी हालात में फंस गई होती!

बहरहाल अपने काम से निपटने के बाद मैंने इस बारे में दरयाफ्त की.

रेलवे से पता चला कि कोई भी ट्रेन अगर 160 किमी से अधिक दूरी तय करती है

और उसकी यात्रा अवधि 4 घंटों से ज्यादा है तो उसमें शौचालय होना ही चाहिए.

मेरी ट्रेन इन दोनों मानकों पर खरी नहीं थी. उज्जैन से दाहोद की दूरी 210 किमी है और ट्रेन इस सफर में करीब 6 घंटे लेती है.

लेकिन उसमें शौचालय नहीं था. पता है क्यों? क्योंकि रेलवे उस ट्रेन को उज्जैन से दाहोद तक चलाता जरूर है, लेकिन सीधा नहीं.

वह ट्रेन उज्जैन से रतलाम तक अलग नाम से जाती है और आधे घंटे बाद रतलाम से दाहोद नए नाम से रवाना हो जाती है.

क्या रेलवे ने यह कवायद केवल शौचालयों का खर्च बचाने के लिए की होगी?

लगता तो नहीं. यह भी शायद उन अनंत पहेलियों में से एक है जिनके बीच भारत सरकार के कई विभाग दशकों से काम करते आ रहे हैं


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