प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी का अपना घर ही साफ़ नहीं

प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी का अपना घर ही साफ़ नहीं

प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी का अपना घर ही साफ़ नहीं भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की

महत्वाकांक्षी राष्ट्रव्यापी परियोजना ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की चमक गुजरात स्थित

प्रधानमंत्री के अपने गृहनगर तक आते आते फीकी सी महसूस होती है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मस्थान होने की वजह से गुजरात सरकार द्वारा एक पर्यटन स्थल के तौर पर विकसित किए जा रहे

वडनगर के दलित बहुल्य मोहल्ले ‘रोहितवास’ में प्रवेश करते ही स्मार्ट फ़ोन में ‘वडनगर वाईफाई’ का सिग्नल तो दस्तक देगा

पर शौच जाने के लिए पूछते ही स्थानीय लोग आपको एक खुले मैदान की तरफ़ ले जाएंगे.

खुले में शौच करने को मजबूर महिलाएं

सुमन, हेत्वी, मोनिका, बिस्वा, अंकिता और नेहा वडनगर के रोहितवास में रहने वाली और रोज़ सुबह स्कूल जाने वाली लड़कियां हैं.

शौच के बारे में पूछने पर यह सभी लड़कियां हमें अपने मोहल्ले के पास बने एक बड़े से खुले मैदान में ले गयीं और बताया

कि उन्हें रोज़ सुबह शौच के लिए यहीं आना पड़ता है.

वडनगर निवासी तीस वर्षीय दक्षा बेन का कहना है कि वडनगर के रोहितवास के सारे गटर खुले हुए रहते हैं. वे कहती हैं,

“छोटी के साथ-साथ बड़ी हो चुकी लड़कियों को भी खुले में संडास जाना पड़ता है.

न ही हमारे पास रहने के लिए घर हैं और न ही हमारे यहां शौचालय बनवाने अभी तक कोई आया है.”

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वादे पूरे नहीं हुए

दक्षा के साथ ही खड़ी निर्मला बेन कहती हैं की मोदी सरकार ने उनसे जो भी वादे किए थे, वो अभी तक पूरे नहीं किए गए हैं.

“हमें कहा था कि सबके रहने के लिए घर होगा और शौचालय भी बनवाएं जाएंगे. पर न घर मिले और न ही शौचालय का वादा पूरा किया गया.”

बीते आठ अक्टूबर को सम्पन्न हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वडनगर दौरे का ज़िक्र करते हुए वह आगे जोड़ती हैं,

“अब जब चुनाव आ गए हैं तो उनको याद आ गया कि अपने पुराने गांव वडनगर भी घूम आएं.

वर्ना इतने सालों में अभी तक कोई भी हमारी फ़रियाद सुनने नहीं आया.”

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वडनगर वासियों के अनुसार तीस हज़ार की जनसंख्या वाली वडनगर नगर पालिका में मौजूद लगभग 500 घरों में शौचालयों की व्यवस्था नहीं है.

बिना शौचालय के ज़्यादातर घर वडनगर के दलित तथा अन्य पिछड़ी जाति बहुल मोहल्ले

जैसे रोहितवास, ठाकुरवास, ओडवास, भोयवास तथा देविपूजक वास में मौजूद हैं.

करोड़ों की योजनाएं, कितना बदला जीवन

खुली नालियों, चोक पड़ी गटरों और टूटी फूटी सड़कों के बीच से होते हुए जब  रोहितवास में आगे बढते हैं

तो अपने एक-एक कमरों के घर के बाहर ही कपड़े साफ़ करती महिलाओं से बात होती है.

दिल्ली का जी बी रोड 

वडनगर को एक ऐतिहासिक पर्यटन स्थल के साथ साथ इसे मेडिकल और तकनीकी सुविधाओं से लैस शहर बनाने के लिए

केन्द्रीय सरकार ने शहर के विकास से जुड़ी विभिन्न विकास योजनाओं के लिए हाल ही में 550 करोड़ रुपयों के फंड की घोषणा की थी.

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इसमें 450 करोड़ रुपयों की लागत से बनने वाला वडनगर का नया अस्पताल और मेडिकल कॉलेज भी शामिल है.

पर अपने हाथ में शौच जाते हुए इस्तेमाल होने वला पानी का पुराना लाल डब्बा दिखाती हुई

सत्तर वर्षीय मानी बेन के जीवन में इन तमाम घोषणाओं से अभी तक कोई सकारात्मक परिवर्तन नहीं आया है.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा ग्रामीण भारत में शौचालय बनावाने के लिए ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के तहत जारी किए गए

1.96 लाख करोड़ के फंड का लाभ अभी तक उनके अपने गृहनगर में नहीं पहुंच पाया है.

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मोदी से क्या चाहती हैं वडनगर की महिलाएं

मानी बेन के साथ ही खड़ी लक्ष्मी बेन, अडकी बेन और अमी बेन को भी वडनगर के आसपास बिखरी

इन चमचमती योजनाओं के बारे में कोई जानकारी नहीं है.

विकास की इस तेज़ दौड़ से बेखबर यह महिलाएं आज भी अपने अपने घरों में सिर्फ एक पक्के शौचालय के निर्माण का इंतज़ार कर रही हैं.

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जब मैंने रोहितवास की महिलाओं से यह प्रश्न किया कि वह इस गुजरात चुनाव से पहले

अपने शहर के अपने प्रधानमंत्री के लिए क्या सन्देश देना चाहेंगी

तो सबने एक सुर में शौचालय निर्माण की मांग उठाई.

पद्मावती के सेट पर आग 

आख़िर में लौटते हुए लक्ष्मी बेन से धीरे से कहा की खुले में शौच के लिए जाने से उनकी और मोहल्ले की बाक़ी बेटियों की आबरू जाती है

इसलिए उनके लिए इस चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा शौचालय ही है.


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